वैज्ञानिकों ने 100 से अधिक वर्षों के अंतराल के बाद पेंगुइन की पहली नई प्रजाति को औपचारिक रूप से मान्यता दी है। चिली और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले (UC Berkeley) के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने आनुवंशिक साक्ष्यों के आधार पर सुदूर करगुएलन द्वीप (Kerguelen Islands) पर रहने वाले जेंटू पेंगुइन की इस आबादी को एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में पहचाना है। यह विस्तृत अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका Communications Biology में प्रकाशित हुआ है।
100 से अधिक वर्षों में पहली नई प्रजाति
दक्षिणी गोलार्ध में पेंगुइन की कई प्रजातियां ऐसे दूरदराज के द्वीपों पर रहती हैं, जहां शोधकर्ताओं का पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। करगुएलन द्वीप, जिसे फ्रेंच में डेसोलेशन आइलैंड्स (Desolation Islands) भी कहा जाता है, किसी भी स्थायी आबादी वाले भूभाग से लगभग 2,000 मील दूर स्थित है। इसी भौगोलिक दूरी के कारण यह आबादी लंबे समय तक वैज्ञानिकों की व्यापक पहचान से बची रही।
शोधकर्ताओं ने इस नई प्रजाति को दक्षिण-पूर्वी जेंटू पेंगुइन (Pygoscelis kerguelensis) का वैज्ञानिक नाम दिया है। यह 100 से अधिक वर्षों में नामित की जाने वाली पेंगुइन की पहली नई प्रजाति बन गई है। यह मुख्य रूप से करगुएलन द्वीप और संभवतः नजदीकी हर्ड द्वीप पर विकसित हुई है।
डीएनए जांच से खुला चार अलग प्रजातियों का राज
वैज्ञानिक समुदाय पहले जेंटू पेंगुइन को एक ही व्यापक प्रजाति मानता था। हालांकि, 10 ब्रीडिंग कॉलोनियों से एकत्र किए गए 64 पेंगुइन के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण (whole-genome sequences) से यह साबित हुआ है कि जेंटू वास्तव में चार अलग-अलग प्रजातियों का समूह है। इनमें तीन उप-प्रजातियां पहले से ज्ञात थीं, जिन्हें अब पूर्ण प्रजाति का दर्जा दिया गया है, जबकि करगुएलन द्वीप की आबादी को पहली बार औपचारिक पहचान मिली है।
चार पहचानी गई प्रजातियों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
- Pygoscelis kerguelensis: दक्षिण-पूर्वी वंशावली, जो करगुएलन और नजदीकी हर्ड द्वीप पर पाई जाती है।
- Pygoscelis ellsworthi: दक्षिणी जेंटू, जो अंटार्कटिक प्रायद्वीप, तटीय अंटार्कटिका और साउथ जॉर्जिया द्वीप पर मौजूद है।
- Pygoscelis taeniata: पूर्वी वंशावली, जो क्रोज़ेट, मैरियन और मैक्वेरी द्वीपों पर रहती है।
- Pygoscelis papua: उत्तरी वंशावली, जो दक्षिण अमेरिका के फ़ॉकलैंड/माल्विनास और मार्टिलो द्वीपों तक सीमित है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक ‘क्रिप्टिक स्पीशीज’ (cryptic species) का उदाहरण है। इसका अर्थ यह है कि शरीर के आकार और आवाजों में मामूली अंतर को छोड़कर, ये पेंगुइन देखने में बिल्कुल अन्य जेंटू जैसे ही लगते हैं—सफेद पेट और काली पीठ के साथ—लेकिन जेनेटिक स्तर पर वे पूरी तरह भिन्न हैं।
खानपान की विविधता और भौगोलिक अलगाव
अध्ययन के अनुसार, इन चारों प्रजातियों का अलगाव पिछले 3,00,000 से 5,00,000 वर्षों के दौरान हुआ। इसमें अंटार्कटिक पोलर फ्रंट (Antarctic Polar Front) ने बड़ी भूमिका निभाई, जो दक्षिणी महासागर में तापमान और लवणता का एक प्रमुख प्राकृतिक विभाजन है।
जेंटू पेंगुइन अन्य पेंगुइन की तुलना में अपने भोजन को लेकर काफी लचीले होते हैं। वे मछली, क्रिल, स्क्विड और कटलफिश जैसे कई प्रकार के जीवों का शिकार करते हैं। भोजन के लिए अधिक दूर न जाने और हर साल एक ही घोंसले के स्थान पर लौटने की प्रवृत्ति ने द्वीपों पर रहने वाली इन आबादियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होने में मदद की, जिससे समय के साथ नई प्रजातियों का विकास हुआ।
स्थानीय पर्यावरण के अनुसार आनुवंशिक बदलाव
यूनिवर्सिटी ऑफ चिली की शोधकर्ता और इस पेपर की पहली लेखक डेली नोल (Daly Noll) के नेतृत्व में हुए जीनोमिक विश्लेषण में हजारों एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपताओं (SNPs) की जांच की गई। आंकड़ों से पता चला कि प्रत्येक प्रजाति ने अपने परिवेश के अनुसार विशेष आनुवंशिक बदलाव किए हैं:
- दक्षिणी जेंटू (Pygoscelis ellsworthi) में अत्यधिक ठंड से निपटने के लिए ऊष्मा उत्पादन, वसा भंडारण और प्रकाश बोध (light perception) से जुड़े जीन अधिक पाए गए।
- पूर्वी जेंटू (Pygoscelis taeniata) में कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म और डाइविंग प्रदर्शन—जैसे ऑक्सीजन परिवहन, फेफड़ों के विकास और माइटोकॉन्ड्रियल गतिविधि—से जुड़े जीन मजबूत थे।
- उत्तरी जेंटू (Pygoscelis papua) में पाचन, हृदय संकुचन और मांसपेशियों की कार्यक्षमता से जुड़े जीन्स अधिक सक्रिय मिले।
2050 तक जलवायु परिवर्तन का संकट
वैज्ञानिकों ने जलवायु मॉडलों का उपयोग करते हुए यह अनुमान लगाया कि 2050 तक इन पेंगुइन के लिए उपयुक्त आवास कहां बचेंगे। मध्यम जलवायु परिवर्तन परिदृश्य के तहत, उप-अंटार्कटिक द्वीपों पर रहने वाली प्रजातियां उन सभी द्वीपों पर अपना उपयुक्त आवास खो सकती हैं जहां वे वर्तमान में मौजूद हैं।
“अंटार्कटिका में अन्य प्रजातियां जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं, न कि जेंटू। लेकिन उप-अंटार्कटिक क्षेत्र में जेंटू सबसे अधिक चिंता का विषय है,” अध्ययन की सह-वरिष्ठ लेखक और चिली की एंड्रेस बेलो नेशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जुलियाना वियाना ने कहा।
वियाना के अनुसार, गर्म होते महासागर, आवास विनाश, चूहों और कुत्तों द्वारा शिकार, और व्यावसायिक मत्स्य पालन के जाल में फंसना भी इन आबादियों के लिए बड़ा खतरा हैं। दूसरी ओर, केवल अंटार्कटिका में रहने वाली दक्षिणी जेंटू प्रजाति पर इसका अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ने और उसकी सीमा के महाद्वीप में आगे विस्तार की संभावना जताई गई है।
संरक्षण के लिए जीनोमिक्स का महत्व
यूसी बर्कले के म्यूजियम ऑफ वर्टिब्रेट जूलॉजी के क्यूरेटर और सह-वरिष्ठ लेखक रौरी बोवी ने बताया कि पूरे जीनोम के इस विशाल डेटासेट का इस्तेमाल केवल वर्गीकरण तक सीमित नहीं है। वर्तमान में प्रोफेसर वियाना इन जीनोम डेटा का उपयोग एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू) से बचाव से जुड़े जेनेटिक लक्षणों की पहचान के लिए कर रही हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन सी पेंगुइन आबादी पर इस बीमारी का सबसे अधिक जोखिम है।
